आजीविका मिशन और आरसेटी के प्रशिक्षण से आत्मनिर्भरता की राह पर अग्रसर हो रही हैं बलरामपुर की ग्रामीण महिलाएं

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उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने तथा स्थानीय स्तर पर आजीविका के स्थायी अवसर उपलब्ध कराने के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर परिलक्षित होने लगे हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और भारतीय ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरसेटी) के संयुक्त तत्वावधान में संचालित कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। इसी क्रम में जनपद बलरामपुर के विकासखंड रेहराबाजार अन्तर्गत ग्राम सरायखास की 29 महिलाओं ने खाद्य प्रसंस्करण एवं फास्ट फूड निर्माण का विशिष्ट प्रशिक्षण प्राप्त कर स्वरोजगार की दिशा में ठोस पहल की है। यह पहल न केवल महिलाओं को सूक्ष्म उद्यमिता से जोड़ रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में भी प्रभावी भूमिका निभा रही है।
तराई क्षेत्र में स्थित जनपद बलरामपुर में पारम्परिक कृषि पर अत्यधिक निर्भरता और स्थानीय स्तर पर रोजगार के सीमित विकल्पों को ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन द्वारा गैर-कृषि आधारित सूक्ष्म उद्यमों को निरन्तर प्रोत्साहित किया जा रहा है। वर्तमान समय में ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के हाट-बाजारों, कस्बों और प्रमुख मार्गों पर तैयार खाद्य पदार्थों की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इस मांग को स्वरोजगार के सुअवसर में परिवर्तित करने के उद्देश्य से सरायखास गांव की स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को लक्षित कर इस व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई, जिससे वे न्यूनतम पूंजी निवेश के साथ अपने निवास क्षेत्र में ही सम्मानजनक आय अर्जित कर सकें।
भारतीय ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान द्वारा आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में महिलाओं को आधुनिक एवं पारम्परिक दोनों प्रकार के लगभग 30 व्यंजनों के मानकीकृत निर्माण का गहन व्यावहारिक अभ्यास कराया गया। प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में चाउमीन, मोमोज, अप्पे, ब्रेड रोल, आलू टिक्की, पानी बताशा तथा दही बड़ा जैसे व्यापक मांग वाले खाद्य पदार्थ शामिल रहे। प्रशिक्षण के दौरान खाद्य पदार्थों के पोषण मूल्य, स्वाद और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया। इसके अतिरिक्त, खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (थ्ैै।प्) द्वारा निर्धारित स्वच्छता मानकों, स्वच्छ जल के उपयोग और खाद्य सामग्री के सुरक्षित भंडारण के वैज्ञानिक तौर-तरीकों का भी विधिवत प्रशिक्षण दिया गया।
कौशल विकास के साथ-साथ महिलाओं को सफल उद्यमी बनाने के लिए सूक्ष्म व्यवसाय प्रबंधन के व्यावहारिक तौर-तरीके भी सिखाए गए। जिला प्रशासन और प्रशिक्षण संस्थान के समन्वय से आयोजित सत्रों में प्रतिभागियों को कच्चे माल की थोक खरीद, लागत निर्धारण, मूल्य सम्वर्धन, दैनिक बिक्री का लेखा-जोखा और शुद्ध लाभ के सटीक आकलन की प्रक्रिया समझाई गई। महिलाओं को ग्राहकों के साथ संवाद शैली, स्टॉल के आकर्षक प्रस्तुतीकरण तथा आधुनिक पैकेजिंग तकनीकों से भी अवगत कराया गया। इस समग्र दृष्टिकोण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना रहा कि महिलाएं केवल कारीगर बनकर न रहें, बल्कि वे अपने सूक्ष्म उद्यम का स्वतंत्र और कुशल प्रबंधन करने में पूरी तरह सक्षम हों।
प्रशिक्षण के उपरान्त उद्यम की स्थापना को सुगम बनाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा महिलाओं को संस्थागत वित्तीय तंत्र से जोड़ने की ठोस कार्ययोजना तैयार की गई है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत गठित स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से रिवॉल्विंग फंड (आरएफ) और कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड (सीआईएफ) की सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री मुद्रा योजना और प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग) के अन्तर्गत बैंकों के साथ समन्वय स्थापित कर रियायती ब्याज दरों पर कार्यशील पूंजी का प्रबन्ध किया जा रहा है, ताकि महिलाओं को निजी स्रोतों से ऋण लेने की आवश्यकता न पड़े और वे वित्तीय रूप से सशक्त बन सकें।
प्रशिक्षित महिलाओं ने रेहराबाजार विकासखंड के प्रमुख चौराहों, ग्रामीण बाजारों, तहसील परिसरों और विकासखंड मुख्यालय के निकट स्वच्छ एवं सुसज्जित फास्ट फूड स्टॉल लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। ग्रामीण महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती कार्यस्थल की दूरी और पारिवारिक उत्तरदायित्वों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की होती है। गांव के समीप ही सूक्ष्म उद्यम संचालित होने से महिलाएं परिवार की देखभाल के साथ-साथ नियमित आय अर्जित करने में सफल हो सकी हैं।
आर्थिक स्वावलम्बन की यह पहल महिलाओं के सामाजिक सशक्तिकरण में भी उत्प्रेरक की भूमिका निभा रही है। जब ग्रामीण महिलाएं प्रत्यक्ष आय अर्जित करती हैं, तो पारिवारिक निर्णयों में उनकी सहभागिता बढ़ती है और बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पोषण स्तर में प्रत्यक्ष सुधार देखने को मिलता है। समूह आधारित गतिविधियों से महिलाओं में परस्पर सहयोग, नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास का संचार हुआ है। स्थानीय स्तर पर स्वयं का व्यवसाय खड़ा करने का यह आत्मविश्वास अन्य ग्रामीण महिलाओं को भी अपनी रुचि और दक्षता के अनुसार कौशल प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
प्रदेश सरकार के ‘मिशन शक्ति‘ अभियान तथा केंद्र सरकार की ‘लखपति दीदी‘ पहल के अनुरूप जनपद बलरामपुर में उठाया गया यह कदम ग्रामीण आजीविका संवर्धन का एक अनुकरणीय उदाहरण बनकर उभरा है। जिला प्रशासन द्वारा सरायखास गांव के इस सफल मॉडल को जिले के अन्य विकासखंडों में भी दोहराने की योजना पर कार्य किया जा रहा है। स्थानीय आवश्यकताओं और बाजार की वास्तविक मांग के अनुरूप दिए जाने वाले ऐसे कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहे हैं, बल्कि पूरे जनपद में समावेशी आर्थिक विकास की नींव को भी मजबूत कर रहे हैं।

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