
लखनऊ/प्रमोद कुमार पूर्व उपनिदेशक सूचना/
शरीर से स्वस्थ सुंदर अच्छी लंबाई के 71 वर्षीय एक पत्रकार संगठन उपज से रहे महासचिव राधेश्याम लाल कर्ण जिनका पत्रकारिता से जुड़ा 17 अक्टूबर 2024 जनपद प्रतापगढ़ में एक कार्यक्रम था. कार्यक्रम के समाप्ति पर रायबरेली के लिए एक सरकारी बस में सवार हुए लगभग 20 -30 किलोमीटर चले होंगे . भाई साहब मिसेज का फोन आ रहा है वह प्रतापगढ़ से बाई कार आ रही है ,बताइए क्या किया जाए ,तो उन्होंने कहा अरे साहब जी डॉक्टर बहु रानी कार से आ रही है चलो बस फस छोड़ें उतर लेते हैं, उनके साथ में बाया कार से चलते है उनको बता दीजिए कि हम लालगंज अझारा में रोड के किनारे चाय की दुकान पर रुके हैं. हम लोग लालगंज अझारा में उतर लिए. धर्मपत्नी जो की प्रतापगढ़ में एक सरकारी अस्पताल में महिला चिकित्सा अधिकारी के रूप में कार्यरत जो स्वयं ड्राइव करके लखनऊ की तरफ आ रही थी को मैंने
कॉल कर धर्मपत्नी से पूछा लोकेशन क्या है ,उन्होंने बताया रास्ते में जाम है लगभग आधा घंटा पहुंचने में लगेगा. मैंने कहा ओके. इसी बीच महामंत्री जी ने मुझे चाय पिलाई, चाय पीने के उपरांत मैंने देखा कि वह जलेबी लेकर आ रहे हैं सोचा शुगर में जलेबी का क्या तालमेल है. उन्होंने हंसी अंदाज में कहा जलेबी खाये फिर देखिए मैं
शुगर को कैसे छूमंतर करता हूं, उनके इस कथन पर मैं अपनी हंसी को रोक नहीं पाया उन्होंने भी मुस्कुराते हुए मुझे और खुद भी जलेबी खाई. जलेबी खाने के उपरांत उन्होंने कहा अब चलिए मेरे साथ , मैंने बोला कहां , बे बोले बस साहब आप मेरे पीछे आते रहे . मैंने कहा ओ के भाई साहब. रोड पार करने के उपरांत वह मुझे एक पानी के बताशे * फुलकी* के ठेले पर ले गए और मुस्कुराते हुए कहा कि फुलकी खाने से जलेबी की मिठास शुगर का असर कम होता है, उनकी बात को सुनकर मैं भी मुस्कुराते हुए फुलकी का आनंद लेने लगा, कुछ देर पश्चात धर्मपत्नी जो कि ड्राइविंग कर रही थी उनके बगल सीट पर मैं बैठ गया और राधेश्याम लाल कर्ण से कहा की आप भाई साहब पीछे आराम से बैठिए ,सोते हुए आपको रायबरेली पहुंचाते हैं, रास्ते में पत्रकारिता जगत के संघर्ष की कुछ किससे सुनते सुनते उनको नींद आ गई .आगे रायबरेली की तहसील सलवन हाईवे पर उनकी आंख खुली तो बोले भाई साहब चाय की तलफ लगी है ,बहुरानी जी आगे गाड़ी रोक लीजिए साहब भाई जी को और आपको चाय पिला देते हैं पता नहीं फिर मौका आपकी गाड़ी पर बैठने का मिले या न मिले . हमने कहा भाई साहब ऐसा क्यों कहते हैं हम तो सोमवार को फिर वापस आएंगे, पुनः आपको लेकर चलेंगे, धन्यवाद ठीक है. लगभग 45 मिनट का सफर कर महामंत्री राधेश्याम लाल कर्ण जी को उनके गंतव्य पर छोड़कर हम आगे लखनऊ के लिए प्रस्थान कर दिए कहा भाई साहब फिर मिलेंगे. एक हफ्ते बाद 25 अक्टूबर को उनके लड़के मान्यता प्राप्त पत्रकार आनंद कर्ण का फोन देर रात्रि आया की अंकल सर जी पापा की अचानक तबीयत खराब हुई अस्पताल ले गए वहां पर उनका देहांत हो गया , बॉडी को लेकर कल डलमऊ घाट लेकर पर अंतिम विदाई के लिए जाना है आप आ जाइए और उनके साथ के जो मित्र हो उनको भी यह दुखद संदेश बता दीजिए . मैं अपने को एकदम दुखद स्थिति में आकर रात भर परेशान रहा रायबरेली प्रातः जाने के लिए दिन का इंतजार करने लगा.
नियति का चक्र भी कितना अजीब और अचंभित करने वाला होता है तब कुछ दिन पहले ही 17 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश की प्रतापगढ़ की धरती पर उस वरिष्ठ पत्रकार के विचारों और पत्रकारिता के अनुभवों से गुंजायमान थी किसी ने सोचा भी नहीं था कि प्रतापगढ़ की उस कार्यक्रम में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाला हो वह शख्स महज 7 दिन की भीतर ही हमसे हमेशा के लिए दूर हो जाएगा. , 25 अक्टूबर2024 को रायबरेली में सहयोगवश उनका आकस्मिक निधन जिसने पत्रकारिता जगत और उनके चाहने वाले को स्तब्ध कर दिया.71 वर्ष की आयु में भी उनके भीतर खबरों को लेकर जो जज्बा और समाज को सही दिखाने की जो ललक थी वह नहीं पीढ़ी के पत्रकारों के लिए किसी प्रेरणा पुंज से कम नहीं थी, जीवन के 7 दशक देख चुके इस अनुभवी पत्रकार ने अपनी लेखनी से हमेशा आम जनता की आवाज को बुलंद किया. किसी भी समर्पित पत्रकार का इस तरह से चले जाना समाज और पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति है, 17 अक्टूबर को एक पत्रकारिता संवर्धन और प्रोत्साहन कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लेना और ठीक एक हफ्ते बाद उनके निधन हो जाने की घटना बेहद हृदय विदारक और विचलित करने वाली है. जहां लोग 71 वर्ष की आयु में अमूमन विश्राम करते हैं वह एक लंबा सा झोला टांगे हर जगह उपस्थित हो जाना उनका 17 अक्टूबर तक सक्रिय रहना और पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रम का हिस्सा बनना यह दिखाता है कि पत्रकारिता उनके लिए सिर्फ एक पेशा नहीं बल्कि उनके जीवन का अंतिम सांस तक चलने वाले मिशन था. प्रतापगढ़ और आसपास के क्षेत्र के युवा पत्रकारों के लिए उनका यह अंतिम योगदान हमेशा मार्गदर्शन की तरह काम करेगा 71 वर्ष की उम्र का उनका अनुभव और अंतिम समय तक का कार्य के प्रति उनका उत्साह आने वाली पीढ़ी को हमेशा प्रेरित करता रहेगा. वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार का जाना केवल एक व्यक्ति के जाना नहीं होता है बल्कि उनके साथ दशकों का इतिहास अनुभव और निष्पक्ष पत्रकारिता साहित्यिक के मूल्य भी चले जाते हैं. उपज महामंत्री रहे राधे श्याम लाल कर्ण हमेशा सादा जीवन उच्च विचार ओर पत्रकारिता को ही अपना आदर्श मानते थे जिन्होंने पत्रकारिता के मूल्य और सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया. महामंत्री उपज राधेश्याम लाल कर्ण 71 वर्ष का यह सफरनामा सादगी संघर्ष और सच्चाई का एक बेहतरीन दस्तावेज था आज भी हमारे बीच में नहीं है तो उनकी लिखी हुई बातें उन्होंने पत्रकारों को जोड़ने व जागरूकता के लिए उनकी यात्राओं के पड़ाव पत्रकारों से जुड़े कार्यक्रम,मार्गदर्शन और समाज के प्रति समर्पण हमेशा याद किया जाएगा.
समाचार पत्र निकलना सिर्फ एक व्यवसाय नहीं बल्कि समाज को बदलने का एक जीवित संघर्ष और जुनून है. महानगरों के बड़े घरानों के विपरीत एक जनपदीय स्थानीय पत्र का संपादन करना, अखबार को जीवित रखना हर दिन एक नई चुनौती जैसा रहता है. पूर्वांचल आजमगढ़ सहित कई जनपदों से निकलने वाला एक दैनिक समाचार पत्र दैनिक देवव्रत इसके संस्थापक स्मृति शेष ठाकुर प्रसाद यादव वर्तमान में युवा संपादक विजय यादव देवव्रत ने बेशुमार समस्या और चुनौतियों का सामना करते हुए लगभग 50 वर्षों से समाचार पत्र निरंतर निकाल कर आमजन की आवाज बना रहे हैं . इसी प्रकार रायबरेली के राधेश्याम लाल कर्ण ने भी रायबरेली जनपद से हिंदी दैनिक सृष्टि जागरण समाचार पत्र को निकल रहे हैं बताते हैं कि एक बार आर्थिक स्थिति खराब होने पर समाचार पत्र को बंद करने का ठाना उसे समय उनकी धर्मपत्नी ने उनका हौसला अफजाई किया और कहा समाचार पत्र किसी भी दिशा में नहीं बंद होगा इसके लिए चाहे मुझको भी कहीं काम करना पड़ जाए पत्नी जो अभी दुनिया में नहीं है उसकी हौसला अफजाई ने राधेश्याम कर्ण को टूटने नहीं दिया, उनकी आखिरी इच्छा थी कि वह अपनी धर्मपत्नी पर किताब लिखे जीते जी उन्होंने एक किताब वर्ष 2015 में ही लिख डाला था किंतु घर में ही किसी कारण बस कहीं इधर-उधर हो गई काफी कोशिश की गई मिल जाए किंतु वह कहीं मिल नहीं पाई जिसका उन्हें हमेशा एक मलाल रहा. राधेश्याम लाल कर्ण के पुत्र आनंदकरण जो कि इस समय उनके द्वारा निकले गए दैनिक समाचार पत्र के संपादक हैं संभवत वह इस दिशा में कुछ न कुछ कार्य कर रहे होंगे ताकि स्मृति शेष राधेश्याम लाल कर्ण ल
अंतिम पत्नी पर किताब लिखने कीइच्छा पूरी हो सके.









