दृढ़ इच्छाशक्ति, सीखने की ललक और सही मार्गदर्शन मिल जाए तो सीमित संसाधनों के बावजूद सफलता की नई राह बनाई जा सकती है। उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जनपद के कड़ा विकासखंड स्थित सैनी गांव की प्रियंका सोनकर ने अपने परिश्रम और डिजिटल ज्ञान के बल पर इसे सच कर दिखाया है। कभी परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित रहने वाली प्रियंका आज चप्पल निर्माण का उद्यम संचालित कर न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि आठ लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रही हैं। उनकी सफलता ग्रामीण महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने और स्वरोजगार के माध्यम से दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर सृजित करने की प्रेरक मिसाल है।
कक्षा 12 तक शिक्षित 28 वर्षीय प्रियंका के परिवार में छह सदस्य हैं और उनकी तीन बेटियां हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी तथा नियमित आय का कोई बेहतर साधन भी उपलब्ध नहीं था। घरेलू जिम्मेदारियों के बीच परिवार की जरूरतों को पूरा करने में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। ऐसे में उन्होंने ऐसा काम शुरू करने का संकल्प लिया, जिसे घर की जिम्मेदारियों के साथ आगे बढ़ाया जा सके और जिससे नियमित आमदनी भी हो।
प्रियंका के जीवन में बदलाव की शुरुआत स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद हुई। वह मां कड़ावासिनी स्वयं सहायता समूह की सदस्य बनीं। बाला जी ग्राम संगठन और बढ़ते कदम महिला संकुल स्तरीय संघ से जुड़कर उन्हें अपनी क्षमताओं को पहचानने तथा स्वरोजगार की संभावनाओं को समझने का अवसर मिला। समूह की बैठकों और उद्यमिता विकास परियोजना के अंतर्गत आयोजित सामुदायिक चर्चाओं ने उनके भीतर अपना व्यवसाय शुरू करने का आत्मविश्वास जगाया।
प्रियंका ने पारंपरिक रास्ते पर चलने के बजाय डिजिटल माध्यम को अपना सीखने का साधन बनाया। यूट्यूब पर चप्पल निर्माण से संबंधित वीडियो देखकर उन्होंने चप्पल बनाने की प्रक्रिया, मशीनों, कच्चे माल और बाजार की जरूरतों के बारे में जानकारी जुटाई। उन्होंने विभिन्न पहलुओं को समझने के बाद अपने स्तर पर व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लिया। शुरुआत में उन्होंने अपनी जमा पूंजी से एक लाख रुपये का निवेश किया और चप्पल निर्माण की एक मशीन लगाकर अपना उद्यम शुरू कर दिया।
चप्पल निर्माण के लिए प्रियंका रबर शीट, सोल बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री, पट्टी और गोंद आदि का उपयोग करती हैं। इन सामग्रियों की प्रमुख आपूर्ति कानपुर से होती है। शुरुआती दौर में सीमित संसाधनों के साथ शुरू हुआ उनका कारोबार धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। व्यवसाय को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने और उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें वित्तीय सहयोग की आवश्यकता महसूस हुई।
उद्यमिता विकास परियोजना के अंतर्गत आयोजित बैठकों में प्रियंका ने अपने व्यवसाय की जरूरतों को सामने रखा। डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स की टीम के सहयोग से उन्हें बढ़ते कदम महिला संकुल स्तरीय संघ के माध्यम से डेढ़ लाख रुपये का ऋण प्राप्त हुआ। इस आर्थिक सहयोग से उन्हें कच्चा माल खरीदने और उत्पादन को व्यवस्थित करने में मदद मिली। साथ ही, उन्हें बैनर, विजिटिंग कार्ड, रजिस्टर, बही-खाता, उद्यम पंजीकरण, वित्तीय प्रबंधन, विपणन और गुणवत्ता नियंत्रण से संबंधित मार्गदर्शन भी मिला। इससे उनके व्यवसाय को व्यवस्थित स्वरूप देने और बाजार में अपनी पहचान बनाने में सहायता मिली।
आज प्रियंका अपने उद्यम का संचालन आत्मविश्वास के साथ कर रही हैं। कच्चा माल खरीदने से लेकर उत्पादन की योजना बनाने, ऑर्डर लेने और ग्राहकों से बातचीत करने तक के महत्वपूर्ण निर्णय वह स्वयं लेती हैं। डिजिटल लेन-देन के लिए स्मार्टफोन और ऑनलाइन भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल कर उन्होंने अपने काम को समय के अनुरूप बनाया है। उनके उद्यम से वर्तमान में आठ लोग जुड़े हुए हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं।
प्रियंका की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनकी आय में हुआ उल्लेखनीय बदलाव है। उद्यम शुरू करने से पहले उनकी मासिक आय लगभग चार हजार रुपये थी। चप्पल निर्माण का व्यवसाय शुरू करने के बाद यह बढ़कर लगभग बीस हजार रुपये प्रतिमाह हो गई है। इस प्रकार उनकी वार्षिक आय लगभग 2.40 लाख रुपये तक पहुंच गई है। बढ़ी हुई आय से परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और उन्हें अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए पहले से अधिक आर्थिक आत्मविश्वास मिला है।
प्रियंका अब अपने कारोबार को और बड़े स्तर पर ले जाना चाहती हैं। इसके लिए उन्हें एक अतिरिक्त चप्पल निर्माण मशीन और लगभग एक लाख रुपये की अतिरिक्त वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। इससे वह उत्पादन क्षमता बढ़ाने, अधिक ऑर्डर पूरे करने, कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और अपने उत्पादों की बाजार तक पहुंच मजबूत करने की उम्मीद रखती हैं।
प्रियंका सोनकर की कहानी बताती है कि डिजिटल ज्ञान, स्वयं सहायता समूहों का सहयोग, उद्यमिता संबंधी प्रशिक्षण और समय पर वित्तीय सहायता ग्रामीण महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। उन्होंने यूट्यूब से जानकारी लेकर अपने उद्यम की नींव रखी, स्वयं सहायता समूह के सहयोग से उसे आगे बढ़ाया और अपने परिश्रम से रोजगार सृजन का माध्यम बनाया। उनकी यात्रा इस विश्वास को मजबूत करती है कि अवसरों को पहचानने और निरंतर प्रयास करने वाली महिलाएं न केवल स्वयं आत्मनिर्भर बन सकती हैं, बल्कि दूसरे परिवारों के लिए भी आजीविका के नए अवसर पैदा कर सकती हैं।




