उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय, लखनऊ द्वारा आयोजित ‘भारतीय मुद्राशास्त्र: परम्परा, विकास एवं विविध आयाम’ विषयक त्रि-दिवसीय कार्यशाला का आज दिनांक 31 अक्टूबर, 2026 को सफलतापूर्वक समापन हुआ। कार्यशाला के तृतीय एवं अंतिम दिवस पर दो सत्र आयोजित किए गए।
कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इस अवसर पर विभाग की निदेशक श्रीमती रेनू द्विवेदी, आमंत्रित अतिथियों, वक्ताओं एवं कार्यशाला के प्रतिभागियों ने सरदार पटेल को श्रद्धांजलि अर्पित की तथा राष्ट्रीय एकता, अखंडता एवं सुरक्षा बनाए रखने की शपथ ग्रहण की।
कार्यशाला के प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ ने ‘सिक्कों का ऐतिहासिक सफर’ विषय पर सचित्र एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने प्राचीन काल से वर्तमान समय तक मुद्रा के विकास की यात्रा को विस्तारपूर्वक समझाया। उन्होंने बताया कि प्रारम्भिक समाज में वस्तु विनिमय प्रणाली के माध्यम से आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती थी, किन्तु वस्तुओं के मूल्य निर्धारण, उनकी पारस्परिक उपयोगिता तथा विनिमय में आने वाली कठिनाइयों के कारण एक सर्वमान्य विनिमय माध्यम की आवश्यकता अनुभव हुई। इसी आवश्यकता ने मुद्रा के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
डॉ. सिंह ने प्राचीन मुद्राओं के निर्माण में धातुओं के चयन, उनकी उपलब्धता, टिकाऊपन, दुर्लभता तथा आर्थिक महत्त्व जैसे पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों की मुद्राओं के उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया कि सिक्के केवल आर्थिक लेन-देन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक सत्ता, शासकों, धार्मिक मान्यताओं, कला, संस्कृति एवं व्यापारिक गतिविधियों के महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य भी हैं।
उन्होंने वर्तमान समय की प्रचलित मुद्राओं एवं प्राचीन सिक्कों की प्रासंगिकता की तुलना करते हुए आधुनिक डिजिटल एवं आभासिक मुद्रा व्यवस्था पर भी विचार व्यक्त किए। इस क्रम में क्रेडिट कार्ड तथा इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणालियों की भूमिका को समझाते हुए बताया कि समय के साथ मुद्रा के स्वरूप एवं लेन-देन के माध्यमों में परिवर्तन हुआ है, लेकिन विनिमय और आर्थिक गतिविधियों में मुद्रा की मूलभूत भूमिका आज भी बनी हुई है।
इस अवसर पर विभाग की निदेशक श्रीमती रेनू द्विवेदी ने मुख्य वक्ता डॉ. विनय कुमार सिंह के व्याख्यान की सराहना करते हुए उसकी शैक्षणिक उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के व्याख्यान विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को मुद्राओं के ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक एवं आर्थिक महत्त्व को समझने का उपयोगी अवसर प्रदान करते हैं। निदेशक महोदया ने सभी आमंत्रित अतिथियों का पौधा एवं स्मृति चिह्न भेंटकर स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा आयोजित ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रमों का उद्देश्य पुरातात्त्विक धरोहरों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ विद्यार्थियों एवं युवा शोधार्थियों को इतिहास के विभिन्न पक्षों से परिचित कराना है। उन्होंने भविष्य में भी इस प्रकार के ज्ञानवर्धक एवं विषयपरक आयोजनों को निरंतर आयोजित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
द्वितीय सत्र में कार्यशाला का समापन समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर प्रो. एस.एन.एन. कपूर तथा कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. के.के. थपल्याल द्वारा प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए।
अपने संबोधन में विशिष्ट अतिथि प्रो. एस.एन.एन. कपूर ने इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजनों की निरंतरता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन अत्यंत उपयोगी हैं, क्योंकि इनके माध्यम से आने वाली पीढ़ी के विद्यार्थियों को प्राचीन मुद्राओं के विकास के क्रमिक चरणों, उनके स्वरूप एवं ऐतिहासिक महत्त्व को समझने का अवसर प्राप्त होता है। उन्होंने मुद्राशास्त्र के अध्ययन को इतिहास एवं पुरातत्त्व के विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. के.के. थपल्याल ने तीन दिनों तक आयोजित कार्यशाला के सभी वक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उनके सारगर्भित एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यानों के लिए साधुवाद दिया। उन्होंने विभाग की निदेशक श्रीमती रेनू द्विवेदी को इस महत्त्वपूर्ण शैक्षणिक आयोजन के लिए धन्यवाद देते हुए भविष्य में भी इसी प्रकार के विविध विषयों पर कार्यशालाओं, व्याख्यानों एवं अकादमिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए प्रोत्साहित किया।
कार्यशाला के माध्यम से प्रतिभागियों को भारतीय मुद्राओं के इतिहास, विकास, निर्माण तकनीक, कलात्मक विशेषताओं तथा ऐतिहासिक महत्त्व को समझने का अवसर प्राप्त हुआ। तीन दिनों तक चले इस शैक्षणिक आयोजन ने मुद्राशास्त्र के प्रति अकादमिक रुचि विकसित करने तथा पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक स्रोतों के अध्ययन को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. मनोज कुमार यादव द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रो. प्रशांत श्रीवास्तव, पूर्व प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ एवं प्रो. दानिश मोइन, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद की गरिमामयी उपस्थिति रही।
इसके अतिरिक्त विभाग की ओर से श्री राम विनय, उत्खनन एवं अन्वेषण अधिकारी, श्री गौरव गुप्ता एवं श्री राहुल त्यागी, सहायक पुरातत्त्व अधिकारी, श्री बलिहारी सेठ, श्री अभयराज सिंह, श्री विनोद कुमार, श्री अनिल कुमार, श्री संतोष कुमार सिंह, श्री आशीष कुमार, श्री अकील खान, श्री अभिषेक कुमार (प्रथम एवं द्वितीय), श्री निर्भय, श्री अंकित, श्री विजय एवं श्री मनोज सहित अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का समापन सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए किया गया।










